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भाषा का बदलता स्वरूप

जगदीश बाली
9418009808
किसी के बात-चीत के अंदाज़ से काफ़ी हद तक उसके व्यक्तित्व का अंदाज़ा लगाया जा सकता है क्योंकि हर एक का अंदाज़-ए-बयाँ अपना अपना होता है। परन्तु धीरे-धीरे हमारी आम बात-चीत में फ़ूहड़ता और भद्दापन आम हो गया है|
कुछ रोज़ पहले एक शाम रोज़ाना की तरह टहल रहा था। टहलते टहलते एक छोटॆ से मैदान के पास से गुज़रना हुआ। वहां कुछ बच्चे खेल रहे थे। तभी मैने देखा एक छोटा सा बच्चा अपनी बहन के साथ झगड़ रहा है। बच्चे की उम्र कोई छः साल और उसकी बहन की उम्र तकरीबन आठ साल प्रतीत हो रही थी। झगड़ते झगड़ते अचानक बच्चे ने अपनी बहन को धक्का दिया और बोला - 'साली मा... लौ... ।' बच्ची तो गिरते-गिरते बची और मम्मी, मम्मी चिल्लाने लगी, पर मैं उस नन्हें से बालक के मुंह से इन शब्दों को सुन कर हक्का बक्का रह गया। मैंने बच्चे को डांटते हुए कहा - 'गंदी बात करता है। ऐसा भी कोई बोलता है क्या?' बच्चा वहां से भागता हुआ बोला - 'जब पापा मम्मी से लड़ते हैं, वो भी तो मम्मी को ऐसा ही बोलते हैं।' ज़ाहिर है बच्चे ने ये भाषा अपने घर में ही सीखी होगी। इसमें बच्चे का दोष नहीं क्योकिं उसे तो ये मालूम भी नहीं होगा कि जो उसने कहा उसके मायने क्या क्या थे। जन्म लेते ही कोई बच्चा बोलना थोड़ी शुरू कर देता है।
दरअसल हमारी रोज़ाना की भाषा में फूहड़पन और अभद्रता आ गयी है। अकसर बच्चे बड़ों के द्वारा इस्तेमाल की गयी भाषा को बड़ी जल्दी अपना लेते हैं। पैंट-कोट-टाई पहने हुए दो जेंटलमैन यार जब मिलते हैं, तो उनके सम्बोधन मैं भी भाषा का बिगड़ा हुआ मिज़ाज़ झलकता है। एक कहता है - ’और भई मा ... ।’ दूसरा जवाब यूँ ज़वाब देता है - ठीक हूँ भई पैं ... ।' आत्मीयता मेँ वे भूल जाते हैं की उनके आस-पास भी दुनिया बसती है। अगर निकट कोई बच्चा हो तो बात दूर तलक पहुंच जाती है। उसे लगता है कि है शायद अपनेपन में ऐसा ही कहना चाहिए। हिंदी फ़िल्मों के संवादों व गानों में तो अब इस तरह की अलंकृत भाषा का इस्तेमाल आम होता जा रहा है।
वैसे बात-चीत के बिगड़े हुए बोलों से आप  विद्यालयों मेँ भी रू-ब-रू हो सकते हैं। मज़े की बात ये है कि छात्र ताबड़तोड़ इन एक्सपलेटिवज़ का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें अहसास तक नहीं होता कि वे क्या बोल रहे हैं। कई बार तो गुरु लोग भी इनका इस्तेमाल करने में मज़बूर दिखते हैं। वे बेचारे भी क्या करें - ज़ुबान पर जो चढ़ गई है ये निगोड़ी ज़बान। किसी आम शौचालय की दीवारों पर जो कुछ लिखा मिलता है, वो लिखने वालों के अंदर छुपे मैल को दर्शाती है। कुछ महाशय अपने अंदर छुपी हुई इस शैतानी को शेर लिख कर भी दर्शाते हैं। कहते हैं कई बार तो ये महाशय मौका पा कर महिलाओं के शौचालयों में घुस कर भी अपनी सृजनात्मकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। ये देख कर छोटे बच्चे भी ऐसी भाषा सीख जाते हैं और छोटे मियाँ कई बार दो कदम आगे निकल जाते हैं - बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे सुभान अल्लाह। 
बच्चे छोटे ज़रूर होते हैं, पर उनके कान लंबे होते हैं अर्थात बच्चे इस बात के प्रति सचेत होते हैं कि माँ-बाप के बीच क्या बातें चल रही हैं। अगर माता-पिता अपने बच्चे को किताबों को सही क्रम में अल्मारी में रखने के लिए कहता है, तो वह इस बात को नज़र अंदाज़ कर सकता है, मगर माता-पिता के बीच होने वाले संवाद के प्रति वे बड़े सचेत होते हैं। दोनों के बीच चल रहे वाद-विवाद, आक्रामक बहस व कहा-सुनी को वे बड़े ग़ौर से सुनते हैं। अगर दोनों के बीच यह अकसर होता रहे, तो बच्चे की वाक्शैली पर इसका प्रभाव अवश्य नज़र आता है।
जिस भाषा में बड़े बात करते हैं, जिस लहज़े और अंदाज़ में बड़े बोलते हैं, वही भाषा और अंदाज़ बच्चों का भी हो जाता है। बच्चे को किसी भी भाषा वाले माहौल में डाल दिया जाए, वह उस भाषा को बिना किसी औपचारिक पढ़ाई के ही सीख जाता है। वे अकसर वही भाषा बोलते हैं, जो वे बड़ों को कहते हुए सुनते हैं। यदि वे बड़ों को गाली-ग़लोज़ करते हुए सुनते हैं, तो वे भी गाली देना सीख जाते हैं; यदि बड़े गुस्से में चिल्लाते हैं, वे भी चिल्ला कर बोलना सीख जाते हैं। उन्हें कई शब्दों के मायने भी पता नहीं होते, परन्तु वे उनका प्रयोग कर लेते हैं। वे ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग कर लेते हैं, जिन्हें सुन कर घर के बड़े सन्न रह जाते हैं। कई बार तो वे टॉयलैट में लिखी अश्लील भाषा के बारे में भी पूछ लेते हैं। दरअसल बड़ों के द्वारा प्रयोग की गई आक्रामक, गंदी व अश्लील भाषा जुकाम की तरह फ़ैलती है - बड़े से बच्चे को, बच्चे से बच्चे को और फिर सारे बच्चों को। 
भाषा का ज्ञान न होना अलग बात है, परन्तु फूहड़ और अभद्र भाषा का नियमित तौर पर इस्तेमाल समाज में बढ़ रहे छिछोरेपन व विकृत  मानसिकता को दर्शाता है। मैं हिंदी दीवस पर अपनी भाषा की पैरवी करने वाले भाषा के पंडियों से ये नहीं पूछूंगा कि हिंदी की पैरवी करने वाले कितनों को मालूम है कि कवर्ग के बाद टवर्ग आता है या चवर्ग। मुझे इससे भी कोई गिला नहीं कि हिंदी की पैरवी करते-करते कितने ’गांधी’ को ’घांदी’ और ’गधा’ को ’घदा’ बोलते हैं, ’नाले’ को ’नाड़ा’ बोलते हैं। मैं इतनी इल्तज़ा ज़रूर करूंगा कि भाषा के बिगड़ते मिज़ाज़ पर भी कुछ चर्चा कर लें, तो शायद आने वाले समय में कम से कम आम बोल-चाल में फ़ूहड़पन कुछ तो कम होगा। लेखक जेम्ज़ रोज़ोफ का कहना है - 'भाषा की फूहड़ता बढ़िया मदिरा की तरह होता है, जिसका इस्तेमाल एक ख़ास समूह मेँ ख़ास समय पर ही किया जा सकता है।‘

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